October 12, 2026

गुमनामी में समा रही आदिमानव काल की निशानी

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जिले मेंं कई स्थान, लेकिन नहीं हो रही पहल

रायगढ़. रायगढ़ जिला में पर्यटन की असीम संभावना है, लेकिन इसे व्यवस्थित करने की पहल नहीं हो रही है। यहीं वजह है कि आदिमानव काल की निशान गुमनामी में समाती जा रही है।
रायगढ़ जिला चारों ओर से आदिमानव सभ्यता की निशानी से घिरा हुआ है। जिले में प्रमुख शैलाश्रय मौजूद हैं। जिला पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में एकत्रित किए गए शैलाश्रय पर गौर करें तो प्रदेश में सबसे अधिक शैलाश्रय रायगढ़ जिले में ही मिले हैं। ऐसे में यहां के अधिकारी भी यह कहते हैं कि जिले में जितने आदिमानव सभ्यता के शैलाश्रय पाए गए हैं उतने अब तक प्रदेश के किसी भी जिले में नहीं मिले हैं। खरसिया, धरमजयगढ़ के अलाव रायगढ़ ब्लाक सहित अन्य जगहों पर आदिमानव द्वारा उकेरे शैलाश्रय पाए जा चुके हैं। उन्हें सहेजने की आवश्यकता है, लेकिन इस दिशा में सार्थक प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। यहीं वजह है कि कुछ जगहों के शैलाश्रय सरंक्षण के अभाव में खराब हो गए हैं, तो कई जगह खराब होने की स्थिति में पहुंच रहे हैं। रायगढ़ जिला मुख्यालय से करीब १८ किलोमीटर दूर खरसिया ब्लाक में आने वाले सिंघनपुर पहाड़ पर आदिमानव द्वारा उकेरे गए शैलचित्र है। करीब डेढ़ दशक पहले इस पहाड़ के नीचे गांव के पास गुफा का प्रवेश द्वारा बनाया गया। वहीं गुफा तक पहुंचने के लिए रास्ता भी बनाया जाना प्रस्तावित था, लेकिन यह प्रस्ताव विभाग की फाइलों से निकला ही नहीं। इससे स्थिति जस की तस है। वहीं पास में संचालित उद्योगों से निकलने वाले धुआं से वहां की स्थिति और भी खराब होती जा रही है।
अज्ञानता से लोग कर रहे खराब
वैसे तो जिले में आदिमानव द्वारा उकेरे गए कई स्थानों पर शैलाश्रय है, जिसे विकसीत करने की आवश्यकता है। यहां प्रशासन नहीं पहुंच रही है, लेकिन लोग कुछ स्थानों पर अवश्य पहुंच रहे हैं, जहां लोग पहुंचते हैं वहां सुरक्षा का अभाव और अज्ञानयता की वजह से शैलाश्रय को खराब कर रहे हैं। कुछ स्थल दुर्गम जगहों पर जो शैलाश्रय हैं वे अब तब सुरक्षित हैं।
जिले इन स्थानों पर है शैलाश्रय
रायगढ़ ब्लाक के कबरा पहाड़, टीपाखोल डैम क्षेत्र में भी शैलाश्रय मौजूद था, लेकिन संरक्षण के अभाव में इस क्षेत्र के शैलाश्रय खराब होकर अब विलुप्त हो चुके हैं। इसके अलावा कबरा पहाड़ से लगा हुआ उषा कोठी व कर्मागढ़ है। तमनार क्षेत्र में बेनीपाठ भैसगढ़ी है। वहीं जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र के ओंगना, सोखामुड़ा, रौताइन भांठा, सुतीधार, भवरखोल, अमरगुफा पोटियां में शैलाश्रय हैं। खरसिया क्षेत्र के सिंघनपुर, बोतल्दा, सोनबरसा, गीधा पहाड़, बसनाझर में भी शैलाश्रय हैं।
इन्हें भी पर्यटन के रूप में किया जा सकता है विकसीत
धरमजयगढ़ से ३५ किलोमीटर दूर नेवार पंचायत में ही सलिहारी फाल है। हालांकि यह पहाड़ी ऊंचाई पर जाने से कोरबा जिला जल जाता है, लेकिन जहां पानी गिरता है वह रायगढ़ जिला है। यहां १२ माह पानी रहता है। वहीं धरमजयगढ़ अंतर्गत नेवार पंचायत में बैलेङ्क्षसग स्टोन नामक जगह है। बैलेसिंग स्टोन इसलिए कहा जाता है कि एक छोटे आकर के पत्थर के ऊपर बड़ा पत्थर वर्षों से टिका हुआ है। चाहे कितनी भी आंधी चले या बारिश हो पत्थर अपने स्थान से टस से मस नहीं होता। धरमजयगढ़ के छुहीपहाड़ का प्राकृतिक नजारा हिल स्टेशन की तरह है। यहां स्थित प्राचीन प्राकृतिक शिवलिंग है। यह जिले के लोगों का प्रमुख आस्था का केंद्र है।एक्सपर्ट व्यू
जिले में पुरातात्विक, ऐतिहासिक, धार्मिक एवं प्राकृतिक महत्व के बहुत से स्थल पर है जिनका विकास कर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। रायगढ़ जिला प्रदेश ही नहीं देश में पर्यटन के क्षेत्र में सिरमौर बन सकता है।
प्रो. डीएस मालिया, सामाजिक वैज्ञानिक एवं सदस्य जिला पुरातत्व संघ/जिला स्तरीय पर्यटन समिति रायगढ़
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